मेरी ख़ामोशियाँ मेरी काव्य रचनाओं का पहला काव्य संग्रह है। इस पुस्तक की विशेषता यह है कि इन कविताओं में मैंने वे सभी भाव व्यक्त करने की चेष्टा की है, जो सामान्यतः हम कहने में झिझकते हैं। इसलिए किताब का शीर्षक ‘मेरी ख़ामोशियाँ’ उपयुक्त लगा। कविताएँ और उनके सन्दर्भ में लिखे लघु लेख मेरी कल्पना से उपजे मेरे अपने विचार हैं। किसी भी भावना को एकांतता दे, छिपाने का प्रयास नहीं किया है। ज़िन्दगी के कई पड़ावों से प्रेरणा लेकर लिखने की हिम्मत की है।
पुस्तक के तीन मुख्य भाग हैं, पहला मेरी ख़ामोशियाँ जो मेरी पछत्तर कविताओं का संग्रह है। दूसरे भाग महफ़िल ए खामोशी में, उर्दू भाषा जो मुख्यतः मेरे मायके लखनऊ-अवध से उपजी मानी जाती है, उसकी नज़ाकत का लुत्फ़ लेकर कुछ नज़्में और गीत संग्रहित हैं। तीसरे भाग ख़याल ए ख़ामोशी में बस चार पंक्तियाँ मेरे जज़्बात और ख़यालों की पेशे ख़िदमत हैं।
काव्य रचनाओं में हर नवरस का स्पर्श कर कुछ भावनाओं को, जैसे माँ की ममता, प्रेयसी के उद्गार, सामान्य रिश्तों के फूलों की खुशबू, राष्ट्रवाद और जीवन दर्शन को विभिन्न रूपों में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। किन्हीं कविताओं में कथाएँ भी बुनीं। हर कविता के साथ उसी विचार से संबंधित एक लघु लेख है, ‘कलम की मनोदशा’ जो मेरी और मेरी क़लम की उस समय की मनोदशा को दर्शाता है, जब वह कविता उत्पन्न हुई थी। हर लेखक की रचनाओं को गढ़ने और उसे प्रस्तुत करने की पृथक शैली होती है। मुझे कविता के साथ-साथ उसका संदर्भ भी आपसे साँझा करना भाता है। किन्तु यह तो पाठक की इच्छा पर निर्भर है, चाहे तो ‘कलम की मनोदशा’ को पढ़ कर कविता पढ़ें अथवा सीधे कविता पाठ करें ।
यह आवश्यक नहीं कि कवि ने उन सभी परिस्थितियों का साक्षात्कार स्वयं ही किया हो जो कविता लेखन की प्रेरणा रहीं हों। वह किसी दूसरे व्यक्ति की परिस्थिति को समझ, उसके भावों को उसी के दृष्टिकोण से देख कर भी अपनी रचनाएँ गढ़ सकता है। यही कविता की सबसे बड़ी चुनौती होती है और एक माप दंड भी, जिस पर कवि की भावाभिव्यक्ति को परखा जा सकता है। अपने आस-पास और सुदूर बसे अनेक प्रियजनों की भावनाओं और जीवन परिस्थितियों ने मुझे भी प्रेरित किया इन में से कुछ कविताएँ लिखने के लिए। मेरे यू ट्यूब चैनल मेरी ख़ामोशियाँ पर इन कविताओं के वीडियोज़ मेरी आवाज़ में प्रस्तुत हैं।
२०१८ में जब, विदेश मंत्रालय की राज्य मंत्री और सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील आदरणीय श्रीमती मीनाक्षी लेखी जी कुवैत आईं, तब यहाँ के एक प्रमुख संगठन भारतीय प्रवासी परिषद-कुवैत के सालाना महोत्सव में उन्होंने मेरी लिखी कविता ‘प्रधान सेवक’, जो हमारे पूज्य आदरणीय प्रधानमंत्री, श्री नरेंद्र मोदी जी के सम्मान में लिए लिखी थी, सभी श्रोताओं के समक्ष पढ़ी और अपने शब्दों में प्रशंसा भी की। उन्होंने अपने इस कविता पाठ का विडियो अपने ट्विटर हैंडल पर भी शेयर किया। इस एक घटना से मुझे यहाँ कुवैत में ख्याति तो मिली ही, साथ ही आत्मविश्वास का संचार हुआ कि मेरी भी कविताएँ पढ़ने योग्य हैं। तभी से मैंने अपनी लेखनी को गंभीरता से लेना शुरू किया और इस पुस्तक पर कार्य आरम्भ किया। आदरणीय मीनाक्षी लेखी जी को शत्-शत् नमन और अनेकानेक धन्यवाद।
मेरी कविता रुपी कल्पना मात्र को पुस्तक का वास्तविक स्वरूप देने में मेरे पति श्री मयंक चतुर्वेदी, मेरी माँ श्रीमती आरती चतुर्वेदी, श्रीमती मेंमुना चोगले जी – कुवैत राइटर्स फोरम की अध्यक्ष, और सुश्री जया त्रिपाठी मेरी अभिन्न मित्र, इन सभी का बड़ा योगदान है। मेरे दोनों पुत्रों, प्रद्युम्न और अनुज का निरंतर प्रोत्साहन और सहयोग भी इस किताब का अभिन्न अंग है।
सबका हृदय से धन्यवाद और आभार